Advertisement

मोहन भागवत के अमेरिका दौरे से परेशानी किसको? विरोध के पीछे क्या है पूरा मामला

RSS प्रमुख मोहन भागवत का अमेरिका दौरा इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा को RSS वैश्विक संपर्क अभियान का हिस्सा बता रहा है। लेकिन अमेरिका में उनके कार्यक्रम को लेकर विरोध भी सामने आया है। सवाल उठ रहा है कि आखिर मोहन भागवत के अमेरिका दौरे से परेशानी किसको है और इसके पीछे वजह क्या है?

मोहन भागवत अमेरिका क्यों गए?

RSS के अनुसार मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा का उद्देश्य भारत, हिंदू समाज और RSS को लेकर दुनिया में मौजूद धारणाओं और आलोचनाओं के बीच अपना पक्ष रखना है।

इस यात्रा में भारतीय मूल के लोगों और हिंदू समुदाय के साथ संवाद बढ़ाने के साथ-साथ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और वैश्विक एकता जैसे विचारों को सामने रखने की बात कही गई है।

न्यूयॉर्क में Universal Oneness Celebration कार्यक्रम में उनका संबोधन इस दौरे का प्रमुख हिस्सा रहा।

अमेरिका में विरोध क्यों हुआ?

भागवत के कार्यक्रम के विरोध में कुछ अमेरिकी नागरिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और इंटरफेथ संगठनों ने आवाज उठाई है।

आलोचकों का आरोप है कि RSS की विचारधारा हिंदू बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देती है और इससे भारत के अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।

दूसरी तरफ RSS इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और खुद को हिंदू सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है।

USCIRF ने क्या कहा?

अमेरिकी US Commission on International Religious Freedom (USCIRF) के कुछ अधिकारियों ने भागवत के दौरे के दौरान RSS के खिलाफ कड़े कदम उठाने की मांग की।

आयोग ने RSS से जुड़े लोगों पर targeted sanctions और भागवत का वीजा रद्द करने जैसे कदमों की सिफारिश की। हालांकि USCIRF की सिफारिशें अपने आप में अमेरिकी सरकार का फैसला नहीं होतीं और रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी सरकार ने इन सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

भारत ने USCIRF की आलोचनाओं को पक्षपातपूर्ण बताया है।

न्यूयॉर्क के मेयर को भी क्यों आपत्ति है?

न्यूयॉर्क के मेयर Zohran Mamdani ने भी RSS की विचारधारा को लेकर आलोचनात्मक रुख अपनाया और कार्यक्रम के प्रति समर्थन नहीं जताया।

उनका विरोध मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि वे RSS की राजनीति को विभाजनकारी और बहिष्करणकारी मानते हैं।

हालांकि कार्यक्रम एक निजी आयोजन था, इसलिए शहर प्रशासन के स्तर पर इसे रोकने का सवाल भी कानूनी और प्रशासनिक सीमाओं से जुड़ा रहा।

क्या पूरा अमेरिका मोहन भागवत के खिलाफ है?

नहीं।

यह समझना जरूरी है कि अमेरिका में भागवत के दौरे का विरोध करने वाले सभी लोग अमेरिकी जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

वहीं दूसरी तरफ उनके कार्यक्रम को समर्थन देने वाले भी बड़ी संख्या में लोग और संगठन मौजूद हैं। AP की रिपोर्ट के अनुसार कार्यक्रम को 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों का समर्थन मिला था।

यानी अमेरिकी भारतीय समुदाय के भीतर भी इस मुद्दे पर राय एक जैसी नहीं है।

भागवत ने अमेरिका में क्या संदेश दिया?

न्यूयॉर्क में अपने संबोधन में मोहन भागवत ने भारत की विविधता और एकता पर जोर दिया।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह वास्तविक अर्थों में हिंदू नहीं है।

उनका संदेश धार्मिक सह-अस्तित्व और मानवता की एकता पर केंद्रित था।

यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि उनके अमेरिका दौरे के दौरान RSS की विचारधारा को लेकर सबसे बड़ा विवाद ही अल्पसंख्यकों और हिंदू राष्ट्रवाद को लेकर था।

असली लड़ाई विचारधारा की है?

काफी हद तक यह मामला RSS की वैश्विक छवि और हिंदू राष्ट्रवाद की व्याख्या से जुड़ा हुआ है।

RSS समर्थकों का कहना है कि संगठन भारतीय संस्कृति, सेवा और हिंदू समाज को जोड़ने का काम करता है।

आलोचकों का कहना है कि RSS की राजनीतिक और वैचारिक भूमिका को लेकर गंभीर सवाल हैं और विदेशों में इसके प्रभाव को लेकर बहस होनी चाहिए।

यही वैचारिक टकराव मोहन भागवत के अमेरिका दौरे के दौरान भी दिखाई दे रहा है।

भागवत के लिए यह दौरा क्यों महत्वपूर्ण है?

RSS के 100 वर्ष पूरे होने के समय यह विदेश दौरा संगठन के लिए केवल एक सामान्य यात्रा नहीं है।

यह दुनिया के सामने RSS की अपनी कहानी और दृष्टिकोण रखने का एक बड़ा अवसर भी है।

अगर RSS अपने समर्थकों और भारतीय मूल के लोगों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है, तो अमेरिका जैसा देश उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

दूसरी तरफ आलोचक इस दौरे को RSS की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की कोशिश के रूप में देखते हैं। कुछ अमेरिकी और मानवाधिकार समूहों ने इसे लेकर विरोध भी किया है।

तो आखिर परेशानी किसको है?

सीधी बात करें तो परेशानी पूरे अमेरिका को नहीं है।

एक तरफ RSS और उसके समर्थक हैं, जो भागवत के दौरे को भारतीय संस्कृति और वैश्विक संपर्क का अभियान मानते हैं।

दूसरी तरफ कुछ मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और इंटरफेथ संगठन हैं, जो RSS की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर सवाल उठाते हैं।

इसके अलावा न्यूयॉर्क के मेयर और USCIRF से जुड़े लोगों की आलोचना ने इस विवाद को और बड़ा बना दिया है।

निष्कर्ष

मोहन भागवत का अमेरिका दौरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक नेता की विदेश यात्रा नहीं है। यह RSS की वैश्विक छवि, हिंदू राष्ट्रवाद, भारतीय प्रवासी समुदाय और धार्मिक सह-अस्तित्व जैसे कई बड़े मुद्दों को एक साथ सामने ला रहा है।

भागवत जहां भारत की विविधता, मानवता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दे रहे हैं, वहीं उनके आलोचक RSS की विचारधारा और उसके प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

यानी असली सवाल यह नहीं है कि “अमेरिका भागवत के खिलाफ है या उनके साथ?”

असली सवाल यह है कि अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों और अमेरिकी समाज के बीच RSS की विचारधारा को लेकर भविष्य में बहस किस दिशा में जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *