विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी विदेशी अदालत से मिला तलाक का आदेश हर परिस्थिति में भारत में अपने आप मान्य नहीं हो जाता। यदि विदेशी अदालत ने ऐसे आधार पर तलाक दिया है, जिसे भारतीय वैवाहिक कानून मान्यता नहीं देता, तो उस आदेश के आधार पर दूसरी शादी करने वाले व्यक्ति को भारत में कानूनी कार्रवाई से स्वतः छूट नहीं मिल सकती।
यह फैसला उन भारतीय नागरिकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो विदेश में रहते हैं, लेकिन उनका विवाह भारत में भारतीय कानूनों के तहत हुआ है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट के सामने एक ऐसे व्यक्ति का मामला आया, जिसकी पहली शादी 18 अप्रैल 2003 को आंध्र प्रदेश के सत्तेनपल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी।
शादी के बाद पति-पत्नी हैदराबाद में रहे। बाद में पति डॉक्टर के रूप में करियर बनाने के लिए ब्रिटेन चला गया और पत्नी भी उसके साथ वहां पहुंची।
कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में विवाद बढ़ गया। पत्नी गर्भावस्था के दौरान भारत अपने मायके लौट आई। पति ने उसे वापस ब्रिटेन बुलाने की कोशिश की, लेकिन वैवाहिक संबंध सामान्य नहीं हो सके।
पति ने पहले भारत में तलाक और बच्चे की अभिरक्षा के लिए कानूनी कार्यवाही की। उसकी याचिकाएं खारिज हो गईं और बाद में उसने हाईकोर्ट में दायर अपील भी वापस ले ली।
इसके बाद पति ने ब्रिटेन की नागरिकता हासिल की और वर्ष 2014 में कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट से तलाक का आदेश प्राप्त किया।
इस आदेश का आधार विवाह का पूरी तरह टूट जाना यानी Irretrievable Breakdown of Marriage था। बाद में उसने ब्रिटेन में दूसरी शादी कर ली।
पहली पत्नी ने भारत में पति के खिलाफ द्विविवाह और आपराधिक साजिश से संबंधित शिकायत दर्ज कराई।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
3 नवंबर को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मामले की सुनवाई की।
अदालत ने कहा कि विदेशी अदालत द्वारा दिया गया तलाक का आदेश भारतीय कानूनों की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह समाप्त करने के लिए निर्धारित कानूनी आधारों का पालन जरूरी है।
केवल यह कहना कि पति-पत्नी का रिश्ता अब नहीं चल सकता, अपने आप में ऐसा आधार नहीं है जिसे भारतीय अदालत हर विदेशी तलाक के मामले में स्वीकार कर ले।
अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 का भी उल्लेख किया। यह धारा विदेशी न्यायालयों के फैसलों की भारत में मान्यता से संबंधित है।
दूसरी शादी पर क्या असर पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पहली शादी भारतीय कानून के तहत वैध रूप से समाप्त नहीं हुई है तो दूसरी शादी से जुड़ा द्विविवाह का आरोप जांच के दायरे में आ सकता है।
अदालत ने आरोपी पति को आपराधिक मामले से राहत देने से इनकार कर दिया।
हालांकि, इस मामले में पति के माता-पिता और दूसरी पत्नी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया। इसका अर्थ है कि अदालत ने सभी आरोपियों के संबंध में एक जैसा आदेश नहीं दिया।
विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए क्या संदेश?
इस फैसले से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी संदेश निकलता है जो विदेश में रहते हुए भारतीय कानूनों के तहत हुए विवाह को समाप्त करना चाहते हैं।
ऐसे मामलों में कुछ महत्वपूर्ण बातें ध्यान में रखनी चाहिए:
- विदेशी अदालत का तलाक आदेश भारत में स्वतः मान्य नहीं होता।
- तलाक के आधार की भारतीय कानून से संगतता जरूरी हो सकती है।
- भारत में पहले से लंबित वैवाहिक मुकदमों की स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है।
- पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त हुए बिना दूसरी शादी करने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
- विदेशी नागरिकता प्राप्त करना अपने आप भारतीय कानूनों से बचने का आधार नहीं है।
क्या यह फैसला सभी विदेशी तलाक पर लागू होगा?
नहीं। इस फैसले को इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि विदेश में लिया गया हर तलाक भारत में अमान्य है।
विदेशी तलाक की मान्यता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित अदालत को अधिकार क्षेत्र प्राप्त था या नहीं, तलाक किस आधार पर दिया गया और भारतीय कानून के तहत उस फैसले की वैधता क्या है।
इसलिए प्रत्येक मामले के तथ्यों और लागू कानूनों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विदेश में रहने वाले भारतीय दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक संबंध समाप्त करने की प्रक्रिया में केवल विदेशी अदालत का आदेश पर्याप्त नहीं हो सकता। भारतीय कानूनों के तहत वैधता की जांच भी जरूरी है।












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