BRICS Summit 2026 में आतंकवाद का मुद्दा भारत के लिए विशेष महत्व रखता रहा। नई दिल्ली घोषणा में BRICS देशों ने आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक और आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। घोषणा में 2025 के पहलगाम आतंकवादी हमले की भी निंदा की गई।
भारत लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि आतंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए।
पहलगाम हमले का संदर्भ
पहलगाम हमला भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मुद्दा रहा है। BRICS घोषणा में इसका उल्लेख भारत के लिए कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत चाहता है कि आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग केवल बयान तक सीमित न रहे बल्कि आतंकवादियों की फंडिंग, सुरक्षित ठिकानों और नेटवर्क पर वास्तविक कार्रवाई हो।
आतंकवाद और Global South
आतंकवाद केवल दक्षिण एशिया की समस्या नहीं है।
अफ्रीका के कई हिस्सों में आतंकी संगठन सक्रिय हैं। पश्चिम एशिया में भी लंबे समय से आतंकवाद और उग्रवाद चुनौती बने हुए हैं।
इसलिए BRICS देशों के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग का दायरा बड़ा हो सकता है।
आतंकवाद की फंडिंग
आतंकवादी संगठनों को वित्तीय संसाधन मिलने से उनकी गतिविधियां जारी रहती हैं।
इसीलिए आतंकवाद के खिलाफ रणनीति में केवल सैन्य कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। बैंकिंग नेटवर्क, अवैध वित्तीय लेनदेन, ड्रग्स, हथियार और डिजिटल माध्यमों के जरिए होने वाली फंडिंग को रोकना भी जरूरी है।
BRICS के भीतर वित्तीय सहयोग बढ़ने से इस क्षेत्र में बेहतर समन्वय की संभावना बन सकती है।
साइबर और डिजिटल आतंकवाद
आज आतंकवादी नेटवर्क सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल करते हैं।
प्रचार, भर्ती, फंडिंग और संचार के लिए डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ा है।
इसलिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साइबर सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हो गई है।
BRICS देशों के बीच डिजिटल सुरक्षा सहयोग बढ़ने से ऐसे नेटवर्क की निगरानी और रोकथाम में मदद मिल सकती है।
भारत का रुख
भारत लगातार कहता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक सुविधा के आधार पर अंतर नहीं होना चाहिए।
यदि एक देश में आतंकवाद को खतरा माना जाता है तो दूसरे देश में उसी संगठन को अलग नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
BRICS मंच पर भारत का यह संदेश व्यापक देशों तक पहुंचता है।
चीन की भूमिका
BRICS में चीन की मौजूदगी इस मुद्दे को और जटिल बनाती है।
भारत और चीन के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद हैं, लेकिन आतंकवाद जैसे वैश्विक मुद्दों पर सहयोग की आवश्यकता बनी रहती है।
यदि दोनों देश आतंकवाद विरोधी सहयोग में व्यावहारिक कदम उठाते हैं तो BRICS की विश्वसनीयता बढ़ सकती है।
रूस और आतंकवाद
रूस भी आतंकवाद और उग्रवाद को गंभीर सुरक्षा चुनौती मानता है।
रूस के पास आतंकवाद विरोधी अभियानों और खुफिया सहयोग का लंबा अनुभव है।
भारत, रूस और अन्य BRICS देशों के बीच जानकारी साझा करने और आतंकवादी वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई से सहयोग बढ़ाया जा सकता है।
आतंकवाद और विकास
आतंकवाद का प्रभाव केवल सुरक्षा पर नहीं पड़ता।
जहां आतंकवाद बढ़ता है वहां निवेश घट सकता है, पर्यटन प्रभावित हो सकता है और रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।
इसलिए आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई आर्थिक विकास से भी जुड़ी हुई है।
BRICS के विकास एजेंडे में सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को एक-दूसरे से अलग नहीं देखा जा सकता।
क्या BRICS नया सुरक्षा गठबंधन है?
नहीं।
BRICS NATO जैसा सैन्य संगठन नहीं है। इसका उद्देश्य सामूहिक सैन्य सुरक्षा गठबंधन बनाना नहीं है।
लेकिन सदस्य देशों के बीच सुरक्षा संवाद और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाना संभव है।
नई दिल्ली घोषणा का संदेश
नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट भाषा का इस्तेमाल भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
इससे भारत को अपनी सुरक्षा चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामने रखने का अवसर मिला।
लेकिन आगे चुनौती यह है कि घोषणाओं को वास्तविक सहयोग में बदला जाए।
निष्कर्ष
BRICS 2026 में आतंकवाद का मुद्दा भारत की प्राथमिकताओं में प्रमुख रहा।
पहलगाम हमले की निंदा, आतंकवाद के खिलाफ zero tolerance और आतंकवादी फंडिंग पर रोक की आवश्यकता ने यह संकेत दिया कि BRICS सुरक्षा सहयोग के क्षेत्र में भी अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है।
यदि सदस्य देश खुफिया जानकारी, वित्तीय निगरानी, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी रणनीतियों में सहयोग बढ़ाते हैं तो BRICS का सुरक्षा आयाम मजबूत हो सकता है।
भारत के लिए यह कूटनीतिक संदेश भी महत्वपूर्ण है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में किसी प्रकार के दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं किए जाने चाहिए।















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