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रोजगार और शिक्षा क्यों नहीं बना पाते चुनावी मुद्दे

रोजगार और शिक्षा चुनावी मुद्दे क्यों नहीं बन पाते - NoOpinion विश्लेषण

आज़ादी के बाद हमारे देश ने अलग अलग समय पर अलग-अलग पार्टियों की सरकारे देखी हैं, देश के आजादी के बाद एक लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार रही उसके बाद देश ने गठबंधन दलों की सरकारों का दौर देखा और पिछले करीब बारह सालों से हम भारतीय जनता पार्टी की बहुमत की सरकार देख रहे हैं, आजेदी के बाद बीते करीब आठ दशकों मे देश में अलग-अलग मुद्दों पर अलग आंदोलन हुए लेकिन बेरोज़गारी और शिक्षा कभी भी सबसे बड़ा मुद्दा है नहीं बन पाया, देश के हर हिस्से में लोग रोज रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, पढ़े लिखे नौजवान हो या अनपढ़ देश में रोजगार मिलने के जो आकड़े है वो डरवाने है अक्सर ऐसी खबरे आती रहती है कि 10 से 10 पदों के लिए लाखों की संख्या में आवेदन आ गए

उत्तर भारत बदनाम लेकिन दक्षिण में भी पलायन कम नहीआम तौर पर यह माना जाता है कि उत्तर भारत जैसे उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड जैसे प्रदेश के नौवजान ही रोजगार के लिए पलायन करते हैं अक्सर भीड़भाड़ वाली ट्रेने उत्तर भारत के पलायन की पहचान बन गई है लेकिन राजगार की तलशा में पलायन इस देश का कड़वा सच है देश में जो राज्य विकसित होने का दावा कर रहे हैं उनके गांवों में घरो की हकीकत कुछ और ही बयां करती है घर सिर्फ 70 से 80 साल के बुजर्गों के लिए ही बचे है घर का नौजवान खाड़ी देशों में किसी देश में रोजगार के लिए घर छोड़कर जा चुका है, बात करें रोजगार के मामले में उत्तर और दक्षिण भारत के फर्क की तो उत्तर भारत में जहां सवाल रोजी-रोटी का है वहीं दक्षिण भारत में सवाल अच्छे जीवन स्तर का है

अनाज उत्पादन तो बढ़ा लेकिन रोजगार की तलाश अब भी
आजादी के बाद से भारत में लगतार जनसंख्या तेजी से बढ़ती रही और देश में सबसे बड़ी समम्य भोजन और सुरक्षा रही क्योंकि हमारे पड़ोस में पाकिस्तान और चीन जैसे देश है, देश में आजादी के करीब 8 दशकों में उन समस्याओं पर विजय भी पा लिय है 1947 में खाद्यान आयात करने वाले देश अब अब अपने खाद्न बाहर भेजने लगा है और उससे एथेनाल भी बनाने लगा है साथ ही हम रक्षा सम्बधी उपकर भी बेचने लगे है, साफ है सरकारों ने जिनसों बड़ी समस्या माना उन पर बहुत हद तक काबू पाया जा चुका है लेकिन देश में अलग-अलग समय पर चुनी गई सरकारों ने रोजगार और शिक्षा को कभी बड़ा मुद्दा माना ही नहीं आखिर ऐसे क्यों

कब मिलेगा ट्रिगर प्वाइंट
दरअसल गुस्से के बाहर आने का एक ट्रिगर प्वांइंट होता है और देश में जब भी आंदोलन हुए है उस समय उस मुद्दे को ट्रिगर प्वाइंट मिला है जैसे देश में लगातार पेपर लिक हो रहे थे सदन में चर्चा के दौरान नेता द्वार पेश किए गए आकड़ों पर नजर डाले तो आकड़ चेठ सौ से पार है लेकिन लोगो का गुस्सा आंदोलन के रूप में तब आया जब नीट का पेपर लिक हुआ और कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली लेकिन बेरजोगारी और की समस्या और शिक्षा प्रणाली में सुघार के लिए आंदोलन शुरू होने के लिए भी भी एक ट्रिगर प्वाइंट का तजार है ।

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