भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होने वाला गणेश उत्सव पूरे भारत में अत्यंत हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भगवान श्री गणेश हर घर और पंडाल में विराजमान होकर अपने भक्तों के सभी दुख और विघ्न हर लेते हैं।
गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूँके, जिनका नाम गणेश रखा गया। जब भगवान शिव द्वार पर आए, तो बालक गणेश ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। क्रोध में आकर शिवजी ने उनका मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
माता पार्वती के विलाप को देखकर भगवान शिव ने एक गज (हाथी) का मस्तक जोड़कर बालक को पुनर्जीवित किया। सभी देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया और भगवान शिव ने गणेश जी को समस्त देवों में ‘प्रथम पूज्य’ होने का वरदान दिया।
गणेश स्थापना और पूजन विधि
- प्रतिमा स्थापना: शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश की मिट्टी (इको-फ्रेंडली) की प्रतिमा घर या सार्वजनिक पंडाल में स्थापित की जाती है।
- प्राण प्रतिष्ठा: वैदिक मंत्रोच्चार के साथ बप्पा की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है।
- प्रिय भोग: भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास), मोदक, मोतीचूर के लड्डू और लाल पुष्प (गुड़हल) अर्पित किए जाते हैं।
- विसर्जन: 10वें दिन अनंत चतुर्दशी को “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” के जयकारों के साथ प्रतिमा का जल में विसर्जन किया जाता है।

गणेश उत्सव का सामाजिक महत्त्व
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी को सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया था। इसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय समाज के सभी वर्गों को एक मंच पर संगठित करना था। आज भी यह पर्व समाज में भाईचारे, समरसता और सांस्कृतिक एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है।

















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