BRICS Summit 2026 ऐसे समय में आयोजित हुआ जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था कई तरह के दबावों से गुजर रही है। टैरिफ, प्रतिबंध, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में बदलाव ने देशों को अपनी व्यापार रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है।
नई दिल्ली घोषणा में BRICS देशों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अधिक स्थिर, खुला और निष्पक्ष बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही एकतरफा व्यापारिक और आर्थिक उपायों से होने वाले प्रभावों पर चिंता जताई गई।
BRICS के लिए व्यापार क्यों महत्वपूर्ण?
BRICS देशों के बीच व्यापार का दायरा बहुत बड़ा है।
ऊर्जा, खाद्य उत्पाद, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, कच्चा माल और औद्योगिक वस्तुओं में सदस्य देशों के बीच व्यापार होता है।
यदि व्यापारिक प्रक्रियाएं आसान होती हैं तो सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ मिल सकता है।
टैरिफ का असर
टैरिफ का मतलब किसी आयातित वस्तु पर लगाया जाने वाला शुल्क है।
जब कोई बड़ा देश टैरिफ बढ़ाता है तो इसका असर केवल दो देशों पर नहीं रहता। वैश्विक सप्लाई चेन में कई देश जुड़े होते हैं।
उत्पादन लागत बढ़ सकती है। कंपनियां नए बाजार खोज सकती हैं। कुछ उद्योगों को फायदा हो सकता है लेकिन दूसरे उद्योगों को नुकसान।
BRICS ऐसे माहौल में वैकल्पिक व्यापारिक साझेदारी बढ़ाने का मंच बन सकता है।
भारत का हित
भारत के लिए BRICS देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के कई फायदे हैं।
भारत अपने इंजीनियरिंग उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पाद, सेवाएं और तकनीकी समाधान नए बाजारों में पहुंचा सकता है।
दूसरी ओर ऊर्जा और कच्चे माल की जरूरतों के लिए भी BRICS देशों के साथ व्यापार महत्वपूर्ण है।
MSME का महत्व
भारत की अर्थव्यवस्था में MSME की बड़ी भूमिका है।
लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार आसान नहीं होता।
भुगतान, मुद्रा विनिमय, लॉजिस्टिक्स, दस्तावेज और बाजार जानकारी जैसी कई बाधाएं होती हैं।
BRICS यदि डिजिटल व्यापार सुविधा और भुगतान व्यवस्था को बेहतर बनाता है तो MSME को बड़ा फायदा हो सकता है।
डिजिटल व्यापार
डिजिटल तकनीक वैश्विक व्यापार को बदल रही है।
ऑनलाइन ऑर्डर, डिजिटल भुगतान, AI आधारित लॉजिस्टिक्स और डिजिटल दस्तावेजों ने व्यापार को तेज बनाया है।
BRICS देशों के बीच डिजिटल व्यापार मानकों में सहयोग से कारोबार की लागत घटाई जा सकती है।
सप्लाई चेन
कोविड महामारी और उसके बाद के भू-राजनीतिक तनाव ने दुनिया को सिखाया कि एक ही देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है।
इसलिए कई देश supply-chain diversification की नीति अपना रहे हैं।
भारत भी manufacturing और supply-chain में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है।
BRICS देशों के साथ सहयोग से भारत को कच्चे माल, ऊर्जा और बाजारों के स्तर पर नए विकल्प मिल सकते हैं।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार
व्यापार और मुद्रा का संबंध भी महत्वपूर्ण है।
यदि BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में अधिक व्यापार करते हैं तो कुछ लेनदेन में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है।
लेकिन इसके लिए बैंकिंग व्यवस्था और मुद्रा विनिमय तंत्र मजबूत होना जरूरी है।
व्यापार और राजनीति
BRICS का व्यापारिक एजेंडा राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, निर्यात नियंत्रण और तकनीकी प्रतिबंध व्यापार को प्रभावित करते हैं।
रूस और ईरान जैसे देशों पर लगे प्रतिबंधों ने वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था की बहस को तेज किया है।
लेकिन भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के बीच संतुलन बनाए रखे।
क्या BRICS G7 का व्यापारिक विकल्प है?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
BRICS का आर्थिक आकार बड़ा है, लेकिन सदस्य देशों की आर्थिक संरचना और व्यापार नीतियां अलग-अलग हैं।
BRICS की वास्तविक ताकत शायद किसी दूसरे समूह को बदलने में नहीं बल्कि व्यापार के अतिरिक्त विकल्प बनाने में है।
भविष्य में क्या होगा?
यदि BRICS देशों के बीच व्यापार समझौते, डिजिटल भुगतान, सीमा शुल्क सहयोग और लॉजिस्टिक्स में सुधार होता है तो समूह की आर्थिक भूमिका मजबूत होगी।
भारत के लिए इसका मतलब अधिक बाजार और अधिक निर्यात अवसर हो सकता है।
निष्कर्ष
BRICS 2026 ने वैश्विक व्यापार के बदलते स्वरूप पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।
टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव के बीच BRICS देशों के लिए आपसी व्यापार बढ़ाना एक रणनीतिक आवश्यकता बन सकता है।
भारत के लिए MSME, manufacturing, services और exports में नए अवसर बन सकते हैं।
लेकिन सफलता घोषणाओं से नहीं बल्कि व्यापार की वास्तविक लागत कम करने और बाजारों को खोलने से मिलेगी।















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