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BRICS और UN सुधार: क्या भारत को Security Council में स्थायी सीट मिलेगी?

BRICS aur UN sudhar: kya bharat ko Security Council mein sthayi seat milegi?

BRICS 2026 में भारत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। नई दिल्ली में आयोजित शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ाने और ग्लोबल साउथ को निर्णय प्रक्रिया में अधिक स्थान देने की जरूरत बताई।

भारत के लिए यह मुद्दा नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से भारत UN Security Council में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि दुनिया की बड़ी आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक राजनीति में बढ़ती भूमिका के बावजूद वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना आज की वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।

BRICS क्यों महत्वपूर्ण मंच है?

BRICS में दुनिया की कई बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ अब समूह का विस्तार भी हो चुका है।

यदि BRICS के सदस्य वैश्विक शासन सुधार पर सामूहिक आवाज बनाते हैं तो इसका अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ सकता है।

भारत चाहता है कि ग्लोबल साउथ को केवल वैश्विक नियमों का पालन करने वाला पक्ष न माना जाए। मोदी ने इसे rule-taker से rule-shaper बनने की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत से जोड़ा।

Security Council की मौजूदा व्यवस्था

UN Security Council में पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन।

इन देशों के पास veto power है।

भारत का मानना है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को भी अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

भारत के अलावा ब्राजील, जर्मनी और जापान भी लंबे समय से UN Security Council सुधार की चर्चा में प्रमुख नाम रहे हैं।

भारत की दावेदारी

भारत की दावेदारी के पीछे कई कारण हैं।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में है। इसकी अर्थव्यवस्था भी वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण हो चुकी है।

भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में लंबे समय से योगदान देता रहा है।

इसके अलावा भारत परमाणु शक्ति है और इंडो-पैसिफिक, हिंद महासागर और वैश्विक दक्षिण की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

BRICS से कितना फायदा?

BRICS भारत को ऐसा मंच देता है जहां वैश्विक शासन में सुधार की मांग सामूहिक रूप से उठाई जा सकती है।

हालांकि यहां एक जटिलता भी है। चीन खुद Security Council का स्थायी सदस्य है। इसलिए भारत की स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर चीन का रुख महत्वपूर्ण रहेगा।

BRICS के भीतर समर्थन मिलना उपयोगी है, लेकिन UN सुधार के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति जरूरी होगी।

वैश्विक संस्थाओं में वित्तीय सुधार

UN Security Council के अलावा भारत ने IMF और अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में भी सुधार की आवश्यकता बताई है।

विकासशील देशों का तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी हिस्सेदारी बढ़ चुकी है, लेकिन संस्थागत प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ा।

BRICS इस मुद्दे को वित्तीय लोकतंत्रीकरण की बहस से जोड़ रहा है।

Global South की आवाज

BRICS का विस्तार Global South की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है।

एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की समस्याएं केवल सुरक्षा से जुड़ी नहीं हैं। इनमें गरीबी, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, विकास वित्त, स्वास्थ्य और तकनीकी असमानता जैसे मुद्दे शामिल हैं।

भारत का कहना है कि वैश्विक संस्थाओं को इन देशों की वास्तविकताओं को अधिक महत्व देना चाहिए।

क्या सुधार तुरंत होगा?

UN Security Council सुधार आसान नहीं है।

स्थायी सदस्यों की सहमति, महासभा का समर्थन और व्यापक राजनीतिक समझ जरूरी है।

किस देश को कितनी सीट मिलेगी, veto का क्या होगा और नई स्थायी सीटों की संरचना कैसी होगी—इन सभी सवालों पर वर्षों से बहस चल रही है।

इसलिए BRICS Summit में उठाया गया मुद्दा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे तुरंत परिणाम में बदलना कठिन होगा।

भारत के लिए कूटनीतिक लाभ

फिर भी यह मुद्दा भारत के लिए कूटनीतिक लाभ पैदा करता है।

भारत खुद को Global South की आवाज के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ संबंध मजबूत करने में भी यह मुद्दा मदद कर सकता है।

भारत यदि विकास, स्वास्थ्य, जलवायु और तकनीक जैसे क्षेत्रों में नेतृत्व करता है तो UN सुधार की उसकी मांग को अधिक व्यापक समर्थन मिल सकता है।

BRICS की भूमिका

BRICS का भविष्य केवल आर्थिक सहयोग से तय नहीं होगा। वैश्विक शासन सुधार में इसकी भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यदि BRICS सदस्य देश साझा प्रस्तावों और व्यावहारिक सुधारों पर काम करते हैं तो समूह की राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ेगी।

निष्कर्ष

BRICS 2026 ने UN Security Council सुधार की बहस को फिर वैश्विक चर्चा में ला दिया है।

भारत के लिए स्थायी सदस्यता केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व का मुद्दा है।

हालांकि रास्ता लंबा है, लेकिन BRICS जैसे मंच भारत को अपनी बात व्यापक अंतरराष्ट्रीय समूह के सामने रखने का अवसर देते हैं।

आने वाले वर्षों में असली सवाल यही होगा कि क्या BRICS केवल सुधार की मांग करेगा या वैश्विक संस्थाओं के वास्तविक पुनर्गठन के लिए एक संयुक्त रणनीति भी तैयार करेगा।

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