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BRICS 2026 और पश्चिम एशिया संकट: भारत की कूटनीति की बड़ी परीक्षा

BRICS 2026 aur paschim asia sankat: bharat ki kutniti ki badi pariksha

BRICS 2026 का नई दिल्ली सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और तनाव पूरी दुनिया की चिंता का कारण बना हुआ है। ऐसे माहौल में BRICS देशों का एक साथ बैठना और साझा घोषणा जारी करना अपने आप में महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम है।

नई दिल्ली घोषणा में BRICS देशों ने पश्चिम एशिया में बढ़ती हिंसा पर चिंता जताई और अधिकतम संयम, संवाद और कूटनीति की आवश्यकता पर जोर दिया। इस सहमति का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि BRICS के अंदर ईरान जैसे देश मौजूद हैं, जबकि समूह के अन्य सदस्य देशों के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अलग-अलग रिश्ते हैं।

भारत के सामने चुनौती

भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। इस क्षेत्र का संबंध भारत की ऊर्जा जरूरतों, समुद्री व्यापार, प्रवासी भारतीयों और आर्थिक हितों से भी है।

खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। भारत का तेल और गैस आयात भी इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों, समुद्री मार्गों और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है।

इसलिए भारत के लिए क्षेत्रीय शांति आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल है।

ईरान और UAE की मुलाकात

BRICS Summit के दौरान ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं की बातचीत भी चर्चा में रही। दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय मुद्दों पर कई बार मतभेद रहे हैं, लेकिन BRICS मंच ने उन्हें संवाद का अवसर दिया।

यह BRICS के लिए एक सकारात्मक संकेत है कि संगठन अलग-अलग हित रखने वाले देशों के बीच संवाद की जगह बन सकता है।

क्या BRICS शांति स्थापित कर सकता है?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि BRICS पश्चिम एशिया के युद्ध का समाधान कर सकता है।

BRICS कोई सैन्य गठबंधन नहीं है। इसके सदस्य देशों की विदेश नीतियां अलग हैं।

लेकिन संगठन बातचीत और कूटनीति का मंच जरूर उपलब्ध करा सकता है।

नई दिल्ली घोषणा में विवादों को बातचीत के माध्यम से हल करने की बात इसी दिशा की ओर संकेत करती है।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत strategic autonomy है।

भारत अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध रखता है, लेकिन रूस के साथ भी उसके पुराने संबंध हैं। भारत ईरान के साथ भी ऊर्जा और कनेक्टिविटी से जुड़े हित रखता है।

ऐसे में BRICS के मंच पर भारत की भूमिका बेहद संवेदनशील हो जाती है।

भारत को एक साथ कई पक्षों के साथ संवाद रखना पड़ता है।

समुद्री सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण?

पश्चिम एशिया का संकट समुद्री व्यापार को भी प्रभावित कर सकता है।

तेल, गैस, कंटेनर और अन्य सामान समुद्री मार्गों से दुनिया भर में पहुंचता है। किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ने से परिवहन लागत और बीमा खर्च बढ़ सकते हैं।

BRICS में समुद्री सुरक्षा और seafarers की सुरक्षा पर चर्चा इसी व्यापक आर्थिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS के मंच पर Seafarers Emergency Support Network का प्रस्ताव भी रखा, जिसका उद्देश्य संकट के समय समुद्री कर्मचारियों को सहायता उपलब्ध कराना है।

पश्चिम एशिया और भारत की ऊर्जा सुरक्षा

भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में है। तेल की कीमतों में तेजी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर पड़ सकता है।

महंगे तेल से परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे महंगाई पर दबाव आ सकता है।

इसीलिए भारत पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और समुद्री व्यापार की सुरक्षा को लगातार महत्व देता है।

BRICS की सीमा

BRICS की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके सदस्य देशों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं।

ईरान का क्षेत्रीय दृष्टिकोण अलग है। खाड़ी देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं। भारत अपने रणनीतिक हितों के अनुसार नीति बनाता है। चीन और रूस की अपनी प्राथमिकताएं हैं।

इसलिए BRICS के लिए सर्वसम्मति बनाना कठिन हो सकता है।

फिर भी नई दिल्ली घोषणा का जारी होना यह दिखाता है कि सदस्य देश कम से कम कुछ बुनियादी मुद्दों पर साझा भाषा तैयार कर सकते हैं।

भारत की कूटनीतिक उपलब्धि?

भारत की अध्यक्षता में अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच साझा घोषणा हासिल करना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

विशेषकर तब जब सम्मेलन के आसपास पश्चिम एशिया और अन्य अंतरराष्ट्रीय संकटों की पृष्ठभूमि मौजूद थी।

भारत ने BRICS को किसी एक देश के खिलाफ राजनीतिक मंच बनाने के बजाय सहयोग और संवाद के मंच के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।

आगे की चुनौती

BRICS की विश्वसनीयता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि घोषणा के बाद सदस्य देश क्या करते हैं।

यदि वे संकटग्रस्त क्षेत्रों में संवाद को बढ़ावा देते हैं, समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाते हैं और व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखने में योगदान करते हैं तो BRICS की भूमिका मजबूत होगी।

लेकिन यदि संगठन केवल बयान जारी करने तक सीमित रहा तो उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं।

निष्कर्ष

BRICS 2026 ने पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच दिया। भारत ने संवाद, संयम और बहुपक्षीय सहयोग की दिशा में अपनी भूमिका बनाए रखी।

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि BRICS ने किसी युद्ध का समाधान कर दिया। बल्कि यह है कि अलग-अलग हित रखने वाले देशों ने एक साथ बैठकर शांति और कूटनीति की जरूरत को स्वीकार किया।

भारत के लिए यह आगे भी महत्वपूर्ण रहेगा क्योंकि पश्चिम एशिया की स्थिरता सीधे उसकी ऊर्जा, व्यापार और नागरिक सुरक्षा से जुड़ी है।

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