BRICS Summit 2026 के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या दुनिया अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। नई दिल्ली में हुए BRICS सम्मेलन में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया। लेकिन इस पूरी बहस को “BRICS डॉलर खत्म कर रहा है” कहना सही नहीं होगा।
BRICS ने अभी कोई साझा मुद्रा शुरू नहीं की है। इसके बजाय समूह का जोर ऐसी वित्तीय व्यवस्था बनाने पर है जिसमें सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ाया जा सके। नई दिल्ली घोषणा में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने तथा सीमा-पार भुगतान प्रणालियों पर सहयोग जारी रखने की दिशा दिखाई गई है।
डॉलर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
दशकों से अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। तेल, कमोडिटी, विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय ऋण और बड़े स्तर के सीमा-पार भुगतान में डॉलर की भूमिका बेहद मजबूत है।
इसका मतलब यह है कि यदि कोई देश BRICS का सदस्य भी है, तब भी उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह डॉलर से अलग नहीं हो सकती।
यही वजह है कि BRICS की रणनीति धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाली दिखाई देती है।
स्थानीय मुद्रा व्यापार क्या है?
मान लीजिए भारत और किसी BRICS देश के बीच व्यापार होता है। वर्तमान व्यवस्था में दोनों देशों की कंपनियां डॉलर के माध्यम से भुगतान कर सकती हैं।
यदि दोनों देश स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था विकसित करते हैं तो कुछ लेनदेन सीधे रुपये और संबंधित देश की मुद्रा में हो सकते हैं।
इससे कुछ मामलों में डॉलर कन्वर्जन की जरूरत कम हो सकती है।
लेकिन इसके लिए दोनों देशों के बीच मुद्रा विनिमय, बैंकिंग व्यवस्था, व्यापार संतुलन और भुगतान जोखिम से जुड़े सवालों का समाधान करना होगा।
BRICS की साझा मुद्रा क्यों मुश्किल है?
BRICS की साझा मुद्रा की चर्चा लंबे समय से होती रही है, लेकिन यह आसान परियोजना नहीं है।
भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाओं की संरचना अलग-अलग है।
किसी साझा मुद्रा के लिए मौद्रिक नीति, ब्याज दर, विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय नियम और केंद्रीय बैंक व्यवस्था में बहुत अधिक समन्वय चाहिए।
इसलिए फिलहाल स्थानीय मुद्राओं में व्यापार ज्यादा व्यावहारिक विकल्प है।
New Development Bank की भूमिका
BRICS की वित्तीय रणनीति में New Development Bank यानी NDB महत्वपूर्ण है। बैंक का उद्देश्य विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और टिकाऊ विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।
हाल के वर्षों में NDB के वित्तपोषण में स्थानीय मुद्राओं का महत्व बढ़ा है। 2026 के विश्लेषणों में बैंक के स्थानीय मुद्रा ऋण और सदस्यता विस्तार को Global South के लिए वैकल्पिक विकास वित्त के संदर्भ में देखा गया है।
यदि विकास परियोजनाओं को डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में वित्त उपलब्ध कराया जा सके तो मुद्रा जोखिम कुछ हद तक कम हो सकता है।
भारत के लिए फायदा
भारत के लिए स्थानीय मुद्रा व्यापार कई कारणों से महत्वपूर्ण हो सकता है।
पहला फायदा व्यापार लागत से जुड़ा है। दूसरा फायदा विदेशी मुद्रा जोखिम से जुड़ा है। तीसरा फायदा यह है कि भारतीय कंपनियों को भुगतान के अधिक विकल्प मिल सकते हैं।
MSME क्षेत्र के लिए भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है। बड़ी कंपनियां विदेशी मुद्रा जोखिम को बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं, लेकिन छोटे कारोबारों के लिए मुद्रा परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय भुगतान महंगे हो सकते हैं।
UPI और डिजिटल भुगतान
भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली भी BRICS की आर्थिक कहानी में महत्वपूर्ण है।
UPI ने भारत में तेज और कम लागत वाले डिजिटल भुगतान का एक बड़ा मॉडल प्रस्तुत किया है। यदि BRICS देशों की डिजिटल भुगतान प्रणालियों में बेहतर कनेक्टिविटी विकसित होती है तो व्यापार और पर्यटन दोनों को फायदा हो सकता है।
भविष्य में एक भारतीय पर्यटक या कारोबारी दूसरे BRICS देश में स्थानीय बैंकिंग व्यवस्था के साथ ज्यादा आसानी से भुगतान कर सके, तो सीमा-पार आर्थिक गतिविधियों में बदलाव आ सकता है।
क्या डॉलर कमजोर होगा?
डॉलर की भूमिका तुरंत खत्म होने वाली नहीं है।
अमेरिकी वित्तीय बाजारों का आकार, डॉलर की तरलता और वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था में उसकी गहरी मौजूदगी इसे मजबूत बनाए रखती है।
BRICS की कोशिश इसलिए डॉलर को रातों-रात बदलने की नहीं बल्कि विकल्प बढ़ाने की अधिक दिखाई देती है।
बदलती दुनिया और वित्तीय बहुध्रुवीयता
BRICS की वित्तीय पहल को व्यापक रूप से financial multipolarity की दिशा में देखा जा सकता है।
इसका अर्थ है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक ही मुद्रा और एक ही वित्तीय केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय कई विकल्प मौजूद हों।
रुपया, युआन, रूबल, रियाल और अन्य राष्ट्रीय मुद्राएं कुछ व्यापारिक क्षेत्रों में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।
लेकिन इसके लिए भरोसेमंद बैंकिंग नेटवर्क और स्थिर आर्थिक नीतियां जरूरी होंगी।
सबसे बड़ी चुनौती
सबसे बड़ी चुनौती BRICS देशों के बीच व्यापार असंतुलन और मुद्रा परिवर्तनीयता है।
यदि एक देश दूसरे से बहुत ज्यादा आयात करता है और कम निर्यात करता है तो स्थानीय मुद्रा में व्यापार को संतुलित करना कठिन हो सकता है।
इसके अलावा कुछ देशों में पूंजी नियंत्रण भी हैं। इसलिए BRICS को एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जो सुरक्षित, पारदर्शी और व्यावहारिक हो।
निष्कर्ष
BRICS 2026 ने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बहस को आगे बढ़ाया है। अभी डॉलर का अंत नहीं हो रहा, न ही BRICS की कोई साझा मुद्रा शुरू हुई है।
लेकिन स्थानीय मुद्रा व्यापार, डिजिटल भुगतान और NDB जैसे संस्थानों के माध्यम से BRICS दुनिया को यह संकेत जरूर दे रहा है कि भविष्य की आर्थिक व्यवस्था में विकल्पों की संख्या बढ़ सकती है।
भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि भारत अपने डिजिटल भुगतान, वित्तीय तकनीक और रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को आगे बढ़ाता है, तो आने वाले वर्षों में BRICS के आर्थिक ढांचे में उसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है।















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