BRICS Summit 2026 की सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली घटनाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात रही। नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की बैठक ऐसे समय हुई जब भारत और चीन पिछले कुछ वर्षों की सैन्य और रणनीतिक तनातनी से निकलकर संबंधों को धीरे-धीरे स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह कई वर्षों बाद उनकी भारत यात्रा थी। दोनों देशों के संबंधों में 2020 के गलवान संघर्ष के बाद गंभीर तनाव पैदा हुआ था। इसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती, व्यापार, निवेश और रणनीतिक मामलों में दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ा।
लेकिन पिछले कुछ समय में स्थिति में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं। BRICS 2026 ने दोनों देशों को शीर्ष स्तर पर बातचीत का एक महत्वपूर्ण अवसर दिया।
मोदी और Xi के बीच क्या चर्चा हुई?
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने भारत-चीन संबंधों को स्थिर रखने और मतभेदों को विवाद में बदलने से रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता को द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण बताया।
यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का रुख लगातार यह रहा है कि सीमा पर शांति के बिना सामान्य संबंध पूरी तरह संभव नहीं हैं।
दूसरी तरफ चीन भी भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक संवाद को पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने बाद में दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
सीमा विवाद अभी खत्म नहीं हुआ
मोदी-Xi बैठक को लेकर उत्साह के बावजूद यह समझना जरूरी है कि भारत-चीन के सभी विवाद खत्म नहीं हुए हैं।
दोनों देशों के बीच हिमालयी सीमा को लेकर लंबे समय से विवाद है। 2020 के बाद स्थिति काफी गंभीर हुई थी। बाद में सैन्य और राजनयिक बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश हुई।
लेकिन सीमा विवाद के साथ-साथ व्यापार असंतुलन भी भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन भारत के लिए महत्वपूर्ण आयात स्रोत बना हुआ है। मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर उपकरण, रसायन और कई औद्योगिक उत्पादों के लिए भारत की चीनी आपूर्ति पर निर्भरता है।
व्यापार संबंधों का महत्व
भारत और चीन के बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक संबंध महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
भारत चाहता है कि चीनी बाजार भारतीय उत्पादों के लिए अधिक खुला हो। वहीं चीन भारत के बड़े उपभोक्ता बाजार और विनिर्माण क्षमता को महत्वपूर्ण मानता है।
यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है तो व्यापार, पर्यटन, निवेश और औद्योगिक सहयोग में सुधार की संभावना बन सकती है।
लेकिन भारत अपनी रणनीतिक संवेदनशीलता को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। रक्षा, दूरसंचार, महत्वपूर्ण तकनीक और संवेदनशील बुनियादी ढांचे में भारत चीन को लेकर सावधानी बरतता है।
BRICS के लिए क्यों महत्वपूर्ण है भारत-चीन संबंध?
भारत और चीन BRICS के दो सबसे बड़े और प्रभावशाली सदस्य हैं। दोनों के बीच तनाव BRICS के भीतर सहयोग को प्रभावित कर सकता है।
अगर भारत और चीन आर्थिक मुद्दों पर साथ काम करते हैं तो BRICS की क्षमता बढ़ सकती है। लेकिन यदि दोनों के बीच रणनीतिक विवाद बढ़ता है तो BRICS के लिए साझा एजेंडा आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है।
इसी कारण मोदी-Xi मुलाकात केवल द्विपक्षीय बैठक नहीं थी। इसका प्रभाव पूरे BRICS संगठन पर पड़ सकता है।
रूस की भूमिका
BRICS में रूस भी एक महत्वपूर्ण शक्ति है। भारत और रूस के संबंध पुराने और रणनीतिक हैं। चीन और रूस के बीच भी आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध मजबूत हैं।
इस त्रिकोण में भारत की भूमिका अलग है। भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखता है, चीन के साथ व्यापार करता है और अमेरिका तथा यूरोप के साथ भी रणनीतिक साझेदारी बढ़ाता है।
यही भारत की विदेश नीति को बहु-दिशात्मक बनाता है।
क्या भारत-चीन संबंध पूरी तरह सामान्य होंगे?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
एक बैठक या एक शिखर सम्मेलन से सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास जैसी समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। इसके लिए लगातार सैन्य, कूटनीतिक और राजनीतिक संवाद की जरूरत होगी।
लेकिन बातचीत का जारी रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
BRICS 2026 ने कम से कम यह अवसर दिया कि दोनों देश शीर्ष स्तर पर संवाद कर सकें और भविष्य के संबंधों के लिए कुछ आधार तैयार कर सकें।
भारत के लिए अवसर
यदि भारत-चीन संबंधों में स्थिरता आती है तो इसका फायदा केवल दोनों देशों को नहीं बल्कि पूरे एशिया को हो सकता है।
दोनों देश जलवायु परिवर्तन, व्यापार, स्वास्थ्य, AI, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों पर सहयोग कर सकते हैं।
BRICS इस सहयोग के लिए एक उपयोगी मंच हो सकता है क्योंकि यहां दोनों देशों को तीसरे देशों के साथ भी काम करना पड़ता है।
निष्कर्ष
BRICS 2026 में मोदी-Xi मुलाकात को भारत-चीन संबंधों में सावधानी भरे सुधार का संकेत कहा जा सकता है। यह कोई अंतिम समाधान नहीं है, लेकिन संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर है।
आने वाले समय में असली परीक्षा सीमा पर शांति, व्यापार संतुलन और रणनीतिक भरोसे की होगी।
यदि दोनों देश “मतभेदों को विवाद में न बदलने” के सिद्धांत को व्यवहार में लागू कर पाते हैं, तो BRICS ही नहीं बल्कि पूरे एशिया की आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता को फायदा हो सकता है।















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