BRICS का विस्तार जितना तेज हुआ है, उसके सामने सवाल भी उतने ही बड़े होते गए हैं। एक समय ब्राजील, रूस, भारत और चीन के आर्थिक संवाद के रूप में शुरू हुआ यह समूह अब 11 देशों का व्यापक मंच बन चुका है। दक्षिण अफ्रीका के बाद मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और अन्य नए सदस्यों के जुड़ने से इसका भौगोलिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ा है। भारत सरकार के अनुसार मौजूदा BRICS सदस्य वैश्विक आबादी के लगभग आधे हिस्से और वैश्विक GDP के करीब 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या BRICS अपने बढ़ते आकार के साथ उतनी ही मजबूत एकजुटता भी कायम रख पाएगा?
विस्तार ने BRICS को मजबूत भी किया और जटिल भी
नए देशों के जुड़ने से BRICS की आर्थिक ताकत और भौगोलिक पहुंच बढ़ी है। अब इसमें एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के महत्वपूर्ण देश शामिल हैं।
यह विस्तार ग्लोबल साउथ के लिए एक बड़ा मंच तैयार करता है। ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, व्यापार, तकनीक, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।
लेकिन हर सदस्य देश की विदेश नीति और राष्ट्रीय प्राथमिकताएं अलग हैं।
यही BRICS की सबसे बड़ी चुनौती है।
क्या BRICS एक राजनीतिक गठबंधन है?
BRICS को समझने के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है कि यह NATO जैसी सैन्य गठबंधन व्यवस्था नहीं है। इसके सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं।
भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस का पश्चिम के साथ गंभीर टकराव है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव है। वहीं UAE और दूसरे खाड़ी देश पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के साथ गहरे आर्थिक संबंध रखते हैं।
इसलिए BRICS को एक समान राजनीतिक विचारधारा वाला संगठन मानना सही नहीं होगा।
Reuters के विश्लेषण के अनुसार समूह की स्थापना वैश्विक शासन में पश्चिमी प्रभुत्व को संतुलित करने की इच्छा से हुई थी, लेकिन इसके सदस्य देशों के अलग-अलग हित और विदेश नीतियां लगातार चुनौती बनी हुई हैं।
भारत-चीन संबंध और BRICS
BRICS के भविष्य में भारत और चीन के संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं।
दोनों देश दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और BRICS के दो सबसे महत्वपूर्ण सदस्य भी हैं। दोनों के बीच व्यापारिक संबंध बड़े हैं, लेकिन सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों को जटिल बनाया है।
2026 BRICS Summit के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। Indian Express के अनुसार दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में तनाव के बावजूद कुछ क्षेत्रों में संबंधों को स्थिर करने की कोशिश हुई है, लेकिन व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास जैसी समस्याएं अभी मौजूद हैं।
यदि भारत और चीन BRICS के आर्थिक एजेंडे पर व्यावहारिक सहयोग बढ़ा पाते हैं तो संगठन की क्षमता काफी बढ़ सकती है।
रूस और BRICS
रूस BRICS को पश्चिमी प्रभुत्व के मुकाबले एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखता है। ऊर्जा और कच्चे माल के क्षेत्र में रूस की भूमिका BRICS के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत के लिए रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध महत्वपूर्ण हैं। चीन भी रूस का बड़ा आर्थिक साझेदार है।
लेकिन रूस-पश्चिम संघर्ष के कारण BRICS के सामने एक कठिन संतुलन की स्थिति रहती है। भारत इस मामले में अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने की कोशिश करता है।
पश्चिम एशिया की चुनौती
नए सदस्यों के कारण BRICS अब पश्चिम एशिया की राजनीति से भी ज्यादा प्रभावित होता है।
ईरान और UAE दोनों BRICS के सदस्य हैं, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में उनके हित हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। इसी प्रकार ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर खाड़ी देशों की भूमिका बढ़ गई है।
2026 के BRICS सम्मेलन में पश्चिम एशिया का संघर्ष भी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना हुआ है। Reuters और AP की रिपोर्टों के अनुसार ईरान और UAE के अलग-अलग क्षेत्रीय हितों ने BRICS के भीतर आम सहमति बनाने को जटिल बनाया है।
क्या BRICS एक साझा आवाज बना पाएगा?
यही सबसे बड़ा यक्षप्रश्न है।
यदि BRICS हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एक समान राजनीतिक बयान देने की कोशिश करेगा तो मतभेद बढ़ सकते हैं। लेकिन यदि संगठन आर्थिक, तकनीकी और विकास संबंधी व्यावहारिक सहयोग पर ध्यान केंद्रित करता है तो सफलता की संभावना अधिक होगी।
यानी BRICS को अपनी ताकत शायद राजनीतिक एकरूपता में नहीं, बल्कि व्यावहारिक विविधता के साथ सहयोग में तलाशनी होगी।
कृषि से डिजिटल तकनीक तक
भारत की 2026 अध्यक्षता में BRICS के एजेंडे में कई नए क्षेत्रों को जोड़ा गया है।
कृषि में BRICS Centres of Excellence on Agro-Ecology, Digital Agriculture Network और AGRIN जैसे सहयोगी ढांचे पर काम आगे बढ़ाया गया है। इनका उद्देश्य कृषि अनुसंधान, तकनीक, बीज, डेटा और जलवायु-स्मार्ट खेती में सहयोग बढ़ाना है।
यह पहल खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS देशों की बड़ी आबादी कृषि और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी है।
इसी तरह डिजिटल स्वास्थ्य, वैक्सीन रिसर्च, सैटेलाइट डेटा, जल प्रबंधन और हरित पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग की दिशा में पहल हुई है।
भविष्य का BRICS कैसा होगा?
BRICS के सामने तीन संभावित रास्ते दिखाई देते हैं।
पहला रास्ता: यह धीरे-धीरे एक मजबूत आर्थिक और वित्तीय सहयोग मंच बने।
दूसरा रास्ता: इसका विस्तार और बढ़े तथा यह ग्लोबल साउथ की राजनीतिक आवाज का बड़ा केंद्र बन जाए।
तीसरा रास्ता: सदस्य देशों के मतभेद इतने बढ़ जाएं कि संगठन बड़े फैसलों पर सहमति बनाने में कमजोर पड़ जाए।
इन तीनों में से कौन सा रास्ता चुना जाएगा, यह सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए अवसर
भारत के लिए BRICS का सबसे बड़ा अवसर यही है कि वह विकासशील देशों के बीच संवाद का केंद्र बन सकता है।
भारत पश्चिमी देशों के साथ भी संबंध रखता है और BRICS के भीतर रूस, चीन, ईरान, UAE और अन्य देशों के साथ भी काम करता है। यह स्थिति भारत को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पुल की भूमिका देती है।
भारत की प्राथमिकता यदि आर्थिक विकास, तकनीक, व्यापार, स्वास्थ्य और ऊर्जा सुरक्षा जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर रहती है तो BRICS अधिक प्रभावी हो सकता है।
निष्कर्ष
BRICS का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि इसमें कितने देश शामिल हैं। असली ताकत इस बात में होगी कि सदस्य देश कितने ठोस परिणाम हासिल कर पाते हैं।
यदि BRICS केवल घोषणाओं का मंच बनकर रह गया तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा। लेकिन यदि यह व्यापार को आसान करता है, डिजिटल भुगतान को जोड़ता है, MSME को वैश्विक बाजार देता है, विकास परियोजनाओं को वित्त देता है और ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रभावी ढंग से सामने रखता है, तो आने वाले वर्षों में इसकी भूमिका बहुत बड़ी हो सकती है।
BRICS की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। इसका अगला अध्याय इस बात से लिखा जाएगा कि विविध हितों वाले 11 देश अपनी असहमति के बावजूद कितनी दूर तक साथ चल पाते हैं।















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