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BRICS और नई आर्थिक व्यवस्था: डॉलर से आगे बढ़ने की कितनी तैयारी?

BRICS aur doller: kya nai aarthik vyavastha ki taiyari kar raha hai BRICS?

दुनिया की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब केवल पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कर रही हैं। इसी चर्चा के केंद्र में BRICS भी है। 2026 में भारत की अध्यक्षता में आयोजित BRICS गतिविधियों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा पार भुगतान, वित्तीय संस्थानों में सुधार और डिजिटल पेमेंट कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं।

BRICS को अक्सर डॉलर के विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तविक तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है। BRICS ने अभी कोई साझा मुद्रा स्थापित नहीं की है और निकट भविष्य में एक समान मुद्रा बनाना भी आसान नहीं है। इसके बजाय फिलहाल जोर इस बात पर है कि सदस्य देश अपने-अपने राष्ट्रीय मुद्राओं में अधिक व्यापार कर सकें और भुगतान व्यवस्था को अधिक स्वतंत्र बनाया जा सके।

डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश क्यों?

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका लंबे समय से बहुत मजबूत है। तेल, कमोडिटी, अंतरराष्ट्रीय ऋण और बड़ी संख्या में सीमा पार लेनदेन डॉलर से जुड़े हैं।

लेकिन डॉलर आधारित व्यवस्था के साथ कई देशों को विदेशी मुद्रा जोखिम, अमेरिकी वित्तीय नीतियों और प्रतिबंधों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसी कारण BRICS के कई सदस्य देश वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं।

BRICS के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों ने 2026 में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार और सीमा पार भुगतान को अधिक कुशल, कम लागत वाला और सुरक्षित बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

क्या BRICS की अपनी मुद्रा आएगी?

यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है। लेकिन साझा BRICS मुद्रा बनाना आसान नहीं है।

किसी साझा मुद्रा के लिए सदस्य देशों को मौद्रिक नीति, विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय नियमों और आर्थिक परिस्थितियों में काफी समन्वय करना होगा। BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से बहुत अलग हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था, चीन की अर्थव्यवस्था, रूस की ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था, ब्राजील की कृषि और कमोडिटी आधारित अर्थव्यवस्था तथा मध्य पूर्व के ऊर्जा निर्यातक देशों की आर्थिक संरचना अलग-अलग है।

इसलिए फिलहाल साझा मुद्रा की तुलना में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और आपसी भुगतान प्रणाली अधिक व्यावहारिक रास्ता है।

UPI और BRICS का डिजिटल भविष्य

भारत के लिए यह क्षेत्र खास महत्व रखता है। UPI ने घरेलू डिजिटल भुगतान को जिस स्तर तक पहुंचाया है, उसने भारत को अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था पर चर्चा में मजबूत स्थान दिया है।

BRICS देशों में भी डिजिटल भुगतान प्रणालियां तेजी से विकसित हुई हैं। भारत का UPI और ब्राजील का Pix इसके प्रमुख उदाहरण हैं। Financial Times की रिपोर्ट के अनुसार इन दोनों प्रणालियों ने पिछले 18 महीनों में संयुक्त रूप से 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के लेनदेन प्रोसेस किए हैं। BRICS देशों के बीच इन प्रणालियों को जोड़ने और स्थानीय मुद्राओं में सीमा पार भुगतान को आसान बनाने पर चर्चा चल रही है।

यदि ऐसा नेटवर्क विकसित होता है तो छोटे व्यापारियों, पर्यटकों, छात्रों और कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय भुगतान आसान हो सकता है।

भारत को इससे क्या फायदा?

भारत के लिए स्थानीय मुद्रा व्यापार और डिजिटल भुगतान के कई फायदे हो सकते हैं।

पहला फायदा व्यापार लागत में कमी हो सकता है। यदि दो देशों के बीच भुगतान के लिए कई स्तरों पर डॉलर कन्वर्जन की आवश्यकता कम हो तो लेनदेन की लागत घट सकती है।

दूसरा फायदा विदेशी मुद्रा जोखिम से जुड़ा है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से कंपनियों को डॉलर की कीमत में अचानक होने वाले बदलाव का कुछ प्रभाव कम करने में मदद मिल सकती है।

तीसरा फायदा MSME क्षेत्र को हो सकता है। भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान MSME को वैश्विक व्यापार और व्यापार वित्त से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है।

New Development Bank की भूमिका

BRICS की आर्थिक महत्वाकांक्षा केवल भुगतान व्यवस्था तक सीमित नहीं है। 2015 में स्थापित New Development Bank का उद्देश्य बुनियादी ढांचे और टिकाऊ विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।

BRICS के वित्तीय सहयोग में बैंक की भूमिका को और मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। 2026 में स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण और विकासशील देशों के लिए संसाधन जुटाने की दिशा में NDB की भूमिका बढ़ाने की बात सामने आई है।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विकासशील देशों को सड़क, रेल, ऊर्जा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, जल प्रबंधन और हरित परियोजनाओं के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत है।

IMF और World Bank में सुधार की मांग

BRICS देश लंबे समय से IMF और World Bank जैसे संस्थानों में सुधार की मांग करते रहे हैं। तर्क यह है कि वर्तमान वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की आर्थिक ताकत के अनुपात में उनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है।

2026 में BRICS वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों ने भी वैश्विक विकास वित्तीय संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

यह मुद्दा केवल BRICS तक सीमित नहीं है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई विकासशील देश वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में अधिक भूमिका चाहते हैं।

लेकिन रास्ता आसान नहीं

BRICS की आर्थिक व्यवस्था बनाने में कई बाधाएं हैं। सबसे बड़ी समस्या अलग-अलग आर्थिक नीतियां हैं।

यदि दो देशों की मुद्राओं के बीच व्यापार बढ़ाना है तो विनिमय दर, पूंजी नियंत्रण, व्यापार असंतुलन और भुगतान जोखिम जैसे सवाल सामने आते हैं। Financial Times ने भी BRICS भुगतान प्रणालियों के सामने मुद्रा प्रणालियों की असंगति, पूंजी नियंत्रण और व्यापार असंतुलन जैसी चुनौतियों को रेखांकित किया है।

इसके अलावा डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली में बहुत मजबूत है। केवल BRICS देशों का सहयोग डॉलर को तुरंत चुनौती नहीं दे सकता।

असली बदलाव क्या हो सकता है?

BRICS का सबसे बड़ा बदलाव शायद किसी नई मुद्रा का निर्माण नहीं बल्कि बहु-विकल्पीय वित्तीय व्यवस्था का निर्माण हो सकता है।

इस व्यवस्था में डॉलर महत्वपूर्ण बना रहे, लेकिन उसके साथ यूरो, युआन, रुपया, रियाल और अन्य राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार की गुंजाइश बढ़े। डिजिटल भुगतान नेटवर्क आपस में जुड़ें। विकास बैंक स्थानीय मुद्राओं में वित्त उपलब्ध कराएं।

यदि ऐसा होता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में वित्तीय विकल्प बढ़ेंगे।

भारत की भूमिका

भारत इस प्रक्रिया में संतुलित भूमिका निभाना चाहता है। भारत का लक्ष्य केवल डॉलर का विरोध करना नहीं, बल्कि व्यापार और वित्तीय व्यवस्था को अधिक विविध और समावेशी बनाना है।

यही कारण है कि भारत BRICS के भीतर भुगतान प्रणालियों, MSME, डिजिटल सेवाओं और व्यापार सुविधा जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर जोर दे रहा है।

BRICS की आर्थिक कहानी इसलिए केवल डॉलर बनाम दूसरी मुद्रा की कहानी नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया ऐसी आर्थिक व्यवस्था बना सकती है जिसमें विकासशील देशों के पास अधिक विकल्प हों।

अगर BRICS इस दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ता है तो आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यापार और वित्त की तस्वीर निश्चित रूप से बदल सकती है।

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