दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला इमारत गिरने से राजधानी में एक बार फिर भवन सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हादसे में कम से कम 6 लोगों की मौत हुई है और कई लोग घायल हुए हैं। राहत और बचाव दल मलबे में फंसे लोगों की तलाश में जुटे रहे।
यह हादसा ऐसे इलाके में हुआ है जहां बड़ी संख्या में छात्र और किराएदार रहते हैं। घटना के बाद आसपास के लोगों में भी डर का माहौल है।
इमारत में चल रहा था निर्माण कार्य
रिपोर्टों के मुताबिक हादसे से पहले इमारत में निर्माण और मरम्मत का काम चल रहा था। शुरुआती जांच में भवन के निर्माण और मंजूरी से जुड़े सवाल भी सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार इमारत के पास स्वीकृत बिल्डिंग प्लान और फायर NOC को लेकर भी गंभीर सवाल हैं।
बरसात के मौसम में पुरानी इमारतों में पानी जमा होना और लगातार निर्माण कार्य संरचना पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। हालांकि हादसे का अंतिम कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
छात्रों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
सत्य निकेतन और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में PG और किराए के मकान हैं। यहां देशभर से छात्र पढ़ाई और नौकरी के लिए आते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किराए के मकान और PG में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा के लिए नियमित संरचनात्मक जांच होती है?
अगर किसी भवन में अवैध निर्माण, कमजोर ढांचा या अग्नि सुरक्षा की कमी है तो इसकी जानकारी प्रशासन और भवन मालिक दोनों को होनी चाहिए।
हादसे के बाद प्रशासन की जिम्मेदारी
ऐसी घटनाओं के बाद सिर्फ राहत और मुआवजे की घोषणा काफी नहीं है। जरूरी है कि दिल्ली में पुराने और छात्र-बहुल इलाकों की इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट किया जाए।
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने नियमित संरचनात्मक ऑडिट और सुरक्षा प्रमाणन की दिशा में नीति बनाने की बात कही है।
क्या सबक लेना जरूरी है?
दिल्ली जैसे महानगर में जमीन और आवास की कमी के कारण छोटी जगहों पर बहुमंजिला निर्माण बढ़ा है। लेकिन विकास के साथ सुरक्षा मानकों का पालन भी उतना ही जरूरी है।
निष्कर्ष: सत्य निकेतन हादसा सिर्फ एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है। यह सवाल है कि क्या शहर में रहने वाले लाखों लोगों के लिए भवन सुरक्षा की नियमित निगरानी पर्याप्त है। इस हादसे के बाद दिल्ली में भवनों की जांच और सुरक्षा नियमों को लेकर ठोस कार्रवाई की जरूरत है।















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