रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर एक बूढ़ा आदमी रोज सुबह आकर बैठता था।
हाथ में पुराना बैग, आंखों पर मोटा चश्मा और जेब में एक छोटी-सी तस्वीर।
वह हर ट्रेन को ध्यान से देखता और फिर चुपचाप घर लौट जाता।
लोग उसे पागल समझते थे।
एक दिन स्टेशन पर काम करने वाले युवक ने उससे पूछ लिया—
“बाबा, आप रोज यहां किसका इंतजार करते हैं?”
बूढ़े ने तस्वीर दिखाई।
तस्वीर में करीब 20 साल का एक लड़का था।
उसने कहा—
“मेरा बेटा इसी ट्रेन से शहर गया था। उसने कहा था, जल्दी लौटूंगा।”
बीस साल गुजर चुके थे।
लड़का कभी नहीं लौटा।
युवक ने तस्वीर मोबाइल में खींचकर इंटरनेट पर तलाश शुरू की। कुछ दिनों बाद उसे एक पुराने अस्पताल का रिकॉर्ड मिला।
पता चला कि वह लड़का एक हादसे में घायल हुआ था और उसकी याददाश्त चली गई थी।
कई साल बाद वह दूसरे शहर में रहने लगा था।
युवक ने उसे खोज निकाला।
जब वह स्टेशन पर अपने पिता के सामने आया तो बूढ़े की आंखों में आंसू थे।
उसने बस इतना कहा—
“मुझे पता था तू आएगा।”
कभी-कभी इंतजार उम्र से नहीं, रिश्ते से बड़ा होता है।















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