शहर के पुराने मोहल्ले में एक छोटा-सा मकान था। मकान की सबसे खास चीज थी दीवार पर लगी एक पुरानी घड़ी। दादा जी के जमाने की वह घड़ी हर दिन बिल्कुल सही समय बताती थी।
लेकिन एक अजीब बात थी।
हर रात ठीक 12 बजे घड़ी रुक जाती थी।
घर में रहने वाले आरव ने कई बार घड़ी ठीक करवाई, लेकिन अगले दिन फिर वही कहानी।
एक रात उसने तय किया कि वह जागकर देखेगा।
जैसे ही घड़ी में 12 बजे, उसकी सुइयां रुक गईं। उसी पल पीछे के कमरे से हल्की-सी आवाज आई।
आरव कमरे में पहुंचा तो वहां दादा जी की पुरानी डायरी पड़ी थी।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर कभी यह घड़ी 12 बजे रुक जाए, तो समझना कि मेरा वादा अभी अधूरा है।”
आरव ने पूरी डायरी पढ़ी। उसे पता चला कि दादा जी ने अपने पुराने दोस्त से किया एक वादा कभी पूरा नहीं किया था।
अगले दिन आरव उस दोस्त को खोजने निकल पड़ा।
कई साल बाद दोनों परिवार मिले।
उस रात आरव घर लौटा तो दीवार की घड़ी पहली बार 12 बजे नहीं रुकी।
शायद घड़ी खराब नहीं थी।
शायद उसे सिर्फ एक अधूरी कहानी के पूरा होने का इंतजार था।















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