जंतर मंतर पर हुए छात्र आंदोलन में भले ही बहुत सारे विवाद हुए और पक्ष विपक्ष आमने सामने हो लेकिन एक बात सब मानने को तैयार है छात्रों के जो मुद्दे थे वो जायज थे और संसद इस पर चर्चा करने को भी तैयार नहीं थी सीजेपी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में अलग अलग समय पर सोनम वांगचुक के साथ साथ अलग अलग पार्टियों के नेता अलग-अलग समय पर मंच पर आए और सब ने माना की जो छात्रों की माँग है वो जायज है । छात्रों की माँगो के बारे में देर से सही सरकार ने भी माना की उनकी मांगे जाएज है इसलिए आनन-फानन में ही में परीक्षा के संबंध में कई सारे बिल लाए लाए गए, परीक्षा में सुधारों की बात हुई और परीक्षा में धांधली करने वालों पर सख़्त करवाई की बात हुई यहाँ तक की आनंद में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट भी बना दिए गए
आंदोलन खत्म होने के बाद भी आंदोलन ही है सबसे बड़ा मुद्दा लेकिन इस आंदोलन के बीत जाने के बाद भी पक्ष और विपक्ष छात्र आंदोलन के मुद्दे पर आमने सामने है, सरकार में बैठे लोग जहां आंदोलन के तरिके पर सावल उठा रहे हैं वहीं विपक्ष आंदोलन के कुचलने के तरिकों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है , वीजेपी और सरकार में बैठी पार्टियां प्रधानमंत्री को गाली देने, शब्दों के सही चयन और आंदोलकारियों द्वार पुलिस पर हमले की बात कर रहे हैं वहीं विपक्ष लगातार आंदोलनकारियों पर पुलिस के हमले , आंदोलन को कुचलने का आरोप लगाकर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर हमला कर रहा है , आंदोलन सही या गतल ऐसे में सवाल उठता है की क्या छात्रों का जो आंदोलन था वो कितान सही और कितना गलता सरकार ने उनकी करीब-करीब सभी मांगे मानकर ये तो साफ कर दिया है कि छात्र गलत नहीं थे
हम अगर पाराखी की नज़र से देखें तो ये कह सकते हैं कि छात्रों के आंडोन अक्सर ऐसे ही होते , इससे पहले हुए युवा पीढ़ी के आंदोलनों को देखे तो अराजकता इससे ज्यादा रही है 1989 में आरक्षण विरोधी आंदोलन में जहाँ छात्रों सरकारी सम्पतियों को जमकर नुकासन पहुंचाय कई स्थानों पर बसों में आग लगा दिया लोगों के निजी संसाधनों पर भी छात्रों ने हमले किए आंदोलन के दौरान करोड़ों का नुकसान हुआ , यहां तक कि कई छात्रों ने खुद को आग के हवाले कर लिया । इस आंदोलन को भले हम इस मामले पर एक कह सकते हैं की छात्रों ने पुलिस पर हमला किया, छात्रों ने गाली दी, हालाकिं अभी इसकी की जांच हो रही है, छात्रों पर भी पुलिस ने बल प्रयोग किया लेकिन इस बात के लिए भी छात्रों की तारीख़ की जानी चाहिए की पूरी आंदोलन के दौरान देश भर में अलग अलग हिस्सों में आंदोलन में बहुत व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय सम्पत्ति का नुकसान नहीं पहुंचाया गया, आम पर तौर सब लोग यह मानता है कि भीड़ को कंट्रोल में रखान मुश्किल है और सरकारी एजंसियों ने भी माना है कि इस डोलन में कुछ आसामाजित तत्व भी शामिल हो गए थे तो इसकी संभावना भी बनती है कि पुलिस पर जो हमले हुए थे वो उन आसामाजित तत्वों ने ही किया था आंदोलन का नेतृतव जिन हाथों में था उन्होंने कभी आंदोलन के नेतृत्व तो बड़ी बात है दोलन में हिस्सा भी नहीं लिया था ऐसे में भीड़ को वो पूरी तरह नियंत्रित कर लेगें इसकी संभावना कम थी लेकिन उनके नियंत्रण की प्रशंसा इसलिए करनी होगी क्योंकि इस आंदोलन के दौरान मंच से कभी भी गलत भाषा इस्तेमाल नहीं हुआ किसी नेता को गाली नहीं दी गई, अलग अलग सोशल प्लेटफार्म पर आए छात्रों ने प्रधानमंत्री जी को अपशब्द कहे ये मामले भी दस से बारह ही रिपोर्ट किए गए है ऐसे में इन घटनों के आधार पर आंदोलन को गलत कहना ठीक नहीं होगा
आखिर आंदोलन के मजबूर क्यों हुए छात्र
सवाल उठना लाजमी है कि जिन छात्रों को परीक्षा की तैयारी करनी थी जिनका भविष्य अभी शुरू हुआ है वो छात्र सड़क पर उत्तरने को क्यों मजबूर हुए क्या छात्रों को भविष्य केवल सरकार की जिम्मेजीर है या विपक्ष भी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पाया , अगर हम ठीक से देखें तो कहीं ना कहीं सरकार के साथ साथ विपक्ष में बैठे नेता भी छात्रों के सवाल को ठीक से उठा पाने मे असफल रहे कहीं ना कहीं विपक्ष में बैठे नेता सरकार को छात्रों के बारे में सोचने पर मजबूर नहीं कर पाए ऐसे में छात्रों ने अपने भविष्य का जिम्मा ख़ुद उठाया और धरने पर बैठ गए, इसे पहले भी आजादी के आंदोलन, जेपी मुवमेंट आरक्षण विरोधी आंदोलन , अन्ना के आंदोलन जैसे तमाम आंदोलन में शामिल होते रहे हैं लेकिन पहली बार उनका मुद्दा सिर्फ अपना था सिर्फ अपना मांगे मानने के बाद आंदोलने के खिलाफ क्यों दिखना चाहती है सरकार
सरकार ने जिस तरह छात्रों की माँग एक नियत समय में मान ली उसके लिए सरकार की तारीफ की जानी चाहिए सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं को ठीक से कराने के लिए आनन-फानन में सदन में बिल भी लेकर आई यहाँ तक की अब तक की परीक्षाओं में हूई धोखाधड़ी के ख़िलाफ़ चल रहे मुकदमें की सुनवाई के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट भी बना दिया, शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा भी लिया यहां तक परीक्षाओं को ठीक से करने के लिए नई कमेटी भी बना दी गई यानी सरकार और छात्रों के बीच वार्ता करीब ग़रीब सफल रही और उनकी सभी मांगे मान ली गई लेकिन आंदोलन के समाप्त होने के बाद सरकार की एक धाड़ा लगातार आंदोलन को ग़लत बताने की कोशिश कर रहा है आख़िर क्यों क्या उनकी मांगे ग़लत थी यदि गलत थी तो सरकार ने उसे माना क्यों और सही थी तो अब सरकार में बैठे लोगों जिस तरह हम अपने घर के बच्चों की गलतियों को नजर अंदाज क उन्हें भी माफ कर देना चाहिए और उन्हों पढ़वे लिखने के लिए अकेला छोड़ देना चाहिए




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