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मुफ्त की रेवड़ी बनाम रोजगार

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चुनावों की आहट एक बार पिर तेज हो गई है देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों के ठीक पहले सभी राजनीतिक दलों ने मुफ्त की रेवड़ी की पोटली खोल दी है चाहे वह महिलाओं के नाम पर हो या युवाओं के नाम पर, हर पार्टी चुनाव यह मान चीक है कि बिना मुफ्त की रेवड़ी बाटे चुनाव नही जीते जा सकते हैं और इसका कारण है एआईडीएमके नेता जयललिता से शुरू किया चुनावन जीतने का यह अभियान अब मध्य प्रदेश होते हुए पूरे देश को अपनी आगोश में ले चुना है अब तो राजनीतिक दलों ने ये बात मान लिया है कि बिना फ्री की रेवड़ी बांटे चुनाव जीता ही नहीं जा सकता है

खजाने पर कितना बोझ
भारत में केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारो द्वार फ्री रेवड़ी पर कुल मिलाकर लगभग ₹8.96 लाख करोड़ से ₹10 लाख करोड़ सालाना खर्च किया जा रहा है। वित्तीय शोध और I NDmoney जैसी संस्थाओं की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, यह खर्च देश के कुल शिक्षा और स्वास्थ्य बजट के सामूहिक आवंटन से भी अधिक हो चुका है थोड़ा और विस्तार से इस जानने की कोशिश की करें खाद्य सब्सिडी (Food Subsidy): ₹2.1 से ₹2.3 लाख करोड़ (गरीबों को मुफ्त या बेहद सस्ता राशन)।, उर्वरक सब्सिडी (Fertilizer Subsidy): ₹1.8 से ₹2.0 लाख करोड़ बिजली सब्सिडी (Power Subsidy): ₹1.5 से ₹1.8 लाख करोड़ नकद हस्तांतरण और कल्याणकारी योजनाएं: ₹1 से ₹1.2 लाख करोड़ किसान आय सहायता (जैसे PM-KISAN): लगभग ₹60,000 करोड़ खर्च किये जा रहे हैं

कुछ राज्यों में हालात चिंताजनक
Axis Bank के अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 14 राज्यों ने पिछले दो वर्षों में लोक-लुभावन चुनावी वादों को पूरा करने के लिए करीब ₹2 लाख करोड़ खर्च किए हैं ये खर्च उनकी कुल अर्थव्यवस्था (GSDP) का 0.1% से लेकर 2.7% तक पहुंच गया है। तेलंगाना, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्य इन योजनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले राज्यों में गिने जाते हैं। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई है कि मुफ्त योजनाओं की इस होड़ से राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है और वे बुनियादी ढांचे (जैसे सड़क, अस्पताल और स्कूल) पर कम निवेश कर पा रहे हैं

रोजगार के आभान में मजबूरी बना मुफ्त की रेवड़ी
आखिर धीरे-धीरे मुफ्त की रेवड़ी राजनीतिक दलों या यू कहें सरकारों की मजबूरी क्यों बनते जा रहे हैं इस पर जानकारों की राय साफ है कि रोजगार पैदा करने में असफल सरकारें इन फ्री की रेवड़ी के सहारे जनता का गुस्सा कम कर अपना वोट बैंक साथ रखना चाहती है पिछल करबी 3 दशकों में सरकार ने उद्योग धंधों से अपने हाथ पीछ खिच लिए है एक-एक करके सरकारी उपक्रम या तो बंद हो रहे हैं या किसी निजी घरानों को बेचे ज रहे है, भारत में आईटी सेक्टर तो आगे बढ़ रहा है लेकिन मैनुफैक्टरिग सेक्टर उस तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा है जिस तेजी से देश की जनसंख्या बढ़ रही है ङम आज भी अपने इस्तेमाल के ज्यादा सामान इम्पोर्ट ही कर रहे है

रोजगार ही बचा सकता है मुफ्त की रेवड़ी से
ऐसे में सवाल है कि आखिर मुफ्त की रेवड़ी को रोका कैसे जाए तो इसका सिर्फ एक ही रास्त है देश में रोजगार के अवसर बढ़ाना बिना रोजगार के अवसर को बढ़ाए किसी भी हाल में इसे रोका नहीं जा सकता, सरकारों के सीधे-सीधे इस पर काम करने के साथ-साथ निजी घरानों के उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा और लालफीताशाही को भी कम कर उन लोगों के प्रोत्साहन देने के साथ साथ उनकी राह आसान करनी होगी जो रोजगार को बढ़ावा दे रहे हैं

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