Advertisement

आखिर रांची के छात्र आंदोलन में विपक्ष चुप क्यों?

रांची: झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा है। परीक्षा में कथित अनियमितताओं, पारदर्शिता और जांच की मांग को लेकर छात्र लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के कई दौर के बावजूद अभी तक कोई निर्णायक समाधान नहीं निकल पाया है।

ऐसे समय में एक सवाल लगातार उठ रहा है—आखिर इस आंदोलन में विपक्ष की भूमिका उतनी दिखाई क्यों नहीं दे रही, जितनी दिखाई देनी चाहिए?

छात्रों का मुद्दा राजनीतिक क्यों नहीं बन पा रहा?

छात्रों का आंदोलन सीधे उनके रोजगार और भविष्य से जुड़ा है। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए एक परीक्षा केवल परीक्षा नहीं होती, बल्कि उसके पीछे वर्षों की मेहनत, पैसा और उम्र का बड़ा हिस्सा लगा होता है।

ऐसे में यदि परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो यह केवल छात्रों का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे राज्य के युवाओं का मुद्दा बन जाता है।

फिर सवाल यह है कि विपक्ष इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक अभियान में क्यों नहीं बदल पा रहा?

क्या छात्र खुद राजनीति से दूरी चाहते हैं?

इस सवाल का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। आंदोलनकारी छात्र शुरुआत से ही अपने आंदोलन को राजनीतिक दलों से दूर रखने की कोशिश करते दिखाई दिए हैं। सोशल मीडिया पर भी आंदोलन को राजनीतिक कब्जे से बचाने की चर्चाएं दिखाई देती हैं।

छात्र शायद नहीं चाहते कि उनकी परीक्षा और रोजगार की लड़ाई किसी पार्टी का चुनावी मंच बन जाए।

यही वजह विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी हो सकती है।

विपक्ष के सामने दोहरी मुश्किल

विपक्ष अगर आंदोलन में खुलकर उतरता है तो सरकार उस पर आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा सकती है।

लेकिन अगर विपक्ष पूरी तरह दूरी बनाए रखता है तो उसके सामने दूसरा सवाल खड़ा होता है—जब हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा मुद्दा सड़क पर है, तब विपक्ष कहां है?

यही राजनीतिक दुविधा इस आंदोलन में विपक्ष की भूमिका को कमजोर करती दिखाई दे रही है।

कुछ नेता पहुंचे, लेकिन सवाल फिर भी कायम

यह कहना भी सही नहीं होगा कि कोई भी राजनीतिक नेता छात्रों के साथ नहीं खड़ा हुआ। जयराम महतो ने आंदोलन के समर्थन में निर्जला अनशन का ऐलान किया है और अन्य राजनीतिक आवाजें भी सामने आई हैं।

लेकिन सवाल व्यापक राजनीतिक नेतृत्व की सक्रियता का है।

क्या विपक्ष इस आंदोलन को विधानसभा से लेकर सड़क तक लगातार उठाएगा?

क्या वह सरकार पर स्वतंत्र जांच और परीक्षा सुधार के लिए दबाव बनाएगा?

या फिर यह आंदोलन छात्रों और कुछ स्थानीय नेताओं तक ही सीमित रह जाएगा?

सरकार के लिए भी बड़ा सवाल

आंदोलन केवल विपक्ष के लिए चुनौती नहीं है। सरकार के सामने भी युवाओं का भरोसा कायम करने की बड़ी जिम्मेदारी है।

सरकार और छात्रों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन कई दौर की वार्ता के बाद भी गतिरोध बना हुआ है। आंदोलनकारी स्वतंत्र जांच जैसी मांगों पर कायम हैं।

यदि सरकार वास्तव में छात्रों की चिंता दूर करना चाहती है तो बातचीत को किसी ठोस और भरोसेमंद समाधान तक पहुंचाना जरूरी होगा।

कल के मार्च पर टिकी नजर

छात्रों ने 10 अगस्त को विधानसभा मार्च की चेतावनी दी है। ऐसे में आने वाला दिन आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रशासन भी कानून-व्यवस्था को लेकर तैयारियों में जुटा है।

अब देखना यह है कि विधानसभा मार्च के दौरान विपक्ष छात्रों के साथ कितनी मजबूती से खड़ा दिखाई देता है।

असली सवाल राजनीति नहीं, छात्रों का भविष्य है

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्रों की मांग को केवल सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

छात्रों ने जिस सवाल को उठाया है, वह भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता और उनके भविष्य से जुड़ा है।

अगर परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा टूटता है तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं, पूरी युवा पीढ़ी का होता है।

इसलिए विपक्ष की भूमिका केवल सरकार को घेरने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे छात्रों की जायज मांगों को लोकतांत्रिक मंच पर मजबूती से उठाना चाहिए। वहीं छात्रों को भी अपने आंदोलन की स्वतंत्रता और गैर-राजनीतिक स्वरूप को बनाए रखने का अधिकार है।

निष्कर्ष

रांची का छात्र आंदोलन अब केवल JPSC-JSSC विवाद नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है कि क्या राजनीतिक दल युवाओं के मुद्दों को उनकी जरूरत के समय उतनी गंभीरता से उठाते हैं, जितनी चुनाव के समय उनके वोट की जरूरत होती है?

आने वाले दिनों में सरकार के साथ-साथ विपक्ष की भूमिका भी इस आंदोलन की दिशा तय कर सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *